November 2, 2012

वो पीली पतंग

खुले आसमान में पतंगों का मेला सा था
बिन डोर की पतंग जैसा मेरा हाल कुछ अकेला सा था
मन  की बारिश से मैं कुछ गीली सी थी
मैं पतंग अलबेली कुछ नीली सी थी

बहुत सारी  थी आसमान में 
पर वो पीली वाली कुछ प्यारी लगी 
खामोशी में लहराने की
 उसकी आदत मुझे न्यारी लगी 

अपना आसमान मैं उसके साथ बांटती 
कभी मेरी डोर उसे ,कभी उसकी डोर मुझे काटती 
हालांकि हम दोनों की ऊँचाई अलग थी 
पर साथ में उड़ने की क्या कम तलब थी?

मन ही मन मैं सकुचा गयी थी 
हाँ ,वो पीली वाली पतंग मुझे भा गयी थी 

जानती नहीं थी क़ी 
आसमान को रंगीन होने के लिए बस दो रंगों की ज़रुरत होती है 
और जब वो रंग ढक  ले,अपने में आसमान को 
तो फिर डोर की ज़रुरत किसे होती है?

आसमान छुने का शौक था दोनों को ही पर भूल गए थे की 
दोनों की डोर कभी  एक थी ही नहीं 
तब समझ आया की 
आसमान के दो हिस्से हो गए थे 
और वो रंग,
कुछ फीके हो गए थे  

एहसास हुआ फिर की
आसमान गर अलग भी हो तो क्या गम है?
दोनों खुले उड़ते रहे अपने आसमान में
ये ख़ुशी भी क्या कम है?





4 comments:

  1. This is my favourate of all ur writings

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  2. Thank you :) I am happy you liked it :D:D

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  3. this is brilliant stuff..my favourite.

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  4. bahut hee achi kavita hai.. वो पीली पतंग ...!

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