खुले आसमान में पतंगों का मेला सा था
बिन डोर की पतंग जैसा मेरा हाल कुछ अकेला सा था
मन की बारिश से मैं कुछ गीली सी थी
मैं पतंग अलबेली कुछ नीली सी थी
बहुत सारी थी आसमान में
पर वो पीली वाली कुछ प्यारी लगी
खामोशी में लहराने की
उसकी आदत मुझे न्यारी लगी
अपना आसमान मैं उसके साथ बांटती
कभी मेरी डोर उसे ,कभी उसकी डोर मुझे काटती
हालांकि हम दोनों की ऊँचाई अलग थी
पर साथ में उड़ने की क्या कम तलब थी?
मन ही मन मैं सकुचा गयी थी
हाँ ,वो पीली वाली पतंग मुझे भा गयी थी
जानती नहीं थी क़ी
आसमान को रंगीन होने के लिए बस दो रंगों की ज़रुरत होती है
और जब वो रंग ढक ले,अपने में आसमान को
तो फिर डोर की ज़रुरत किसे होती है?
आसमान छुने का शौक था दोनों को ही पर भूल गए थे की
दोनों की डोर कभी एक थी ही नहीं
तब समझ आया की
आसमान के दो हिस्से हो गए थे
और वो रंग,
कुछ फीके हो गए थे
बिन डोर की पतंग जैसा मेरा हाल कुछ अकेला सा था
मन की बारिश से मैं कुछ गीली सी थी
मैं पतंग अलबेली कुछ नीली सी थी
बहुत सारी थी आसमान में
पर वो पीली वाली कुछ प्यारी लगी
खामोशी में लहराने की
उसकी आदत मुझे न्यारी लगी
अपना आसमान मैं उसके साथ बांटती
कभी मेरी डोर उसे ,कभी उसकी डोर मुझे काटती
हालांकि हम दोनों की ऊँचाई अलग थी
पर साथ में उड़ने की क्या कम तलब थी?
मन ही मन मैं सकुचा गयी थी
हाँ ,वो पीली वाली पतंग मुझे भा गयी थी
जानती नहीं थी क़ी
आसमान को रंगीन होने के लिए बस दो रंगों की ज़रुरत होती है
और जब वो रंग ढक ले,अपने में आसमान को
तो फिर डोर की ज़रुरत किसे होती है?
आसमान छुने का शौक था दोनों को ही पर भूल गए थे की
दोनों की डोर कभी एक थी ही नहीं
तब समझ आया की
आसमान के दो हिस्से हो गए थे
और वो रंग,
कुछ फीके हो गए थे
एहसास हुआ फिर की
आसमान गर अलग भी हो तो क्या गम है?
दोनों खुले उड़ते रहे अपने आसमान में
ये ख़ुशी भी क्या कम है?
आसमान गर अलग भी हो तो क्या गम है?
दोनों खुले उड़ते रहे अपने आसमान में
ये ख़ुशी भी क्या कम है?
This is my favourate of all ur writings
ReplyDeleteThank you :) I am happy you liked it :D:D
ReplyDeletethis is brilliant stuff..my favourite.
ReplyDeletebahut hee achi kavita hai.. वो पीली पतंग ...!
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