November 5, 2012

वापिस

            कार रुकी । कार में से 4 लोग उतरे। दीनानाथ जी ,उनकी धर्मपत्नी सुमेधा जी, उनका बेटा अखिल और उनकी बहु मधु ।
            दीनानाथ जी और सुमेधा जी डबडबायी आँखों से वो उस इमारत को देख रहे थे जहाँ आने की कल्पना उन्होंने सपने में भी नहीं की थी।वो शहर के एक वृद्धाश्रम के सामने खड़े थे । दोनों वृद्ध पति-पत्नी यही सोच रहे थे की क्या गुनाह कर दिया था उन्होंने , कि  उन्हें ये दिन देखना पड़ा,क्या कमी रह गयी थी उनके प्यार में? आर्थिक तंगी के बावजूद भी अपने बेटे को पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर बनाया था और जब बेटे ने कहा की वो अपनी पसंद से शादी करेगा, तब भी उन्होंने बिलकुल मना नहीं किया। मधु एक उच्च परिवार की लड़की थी और सुमेधाजी तो उसे पलकों पे रखती । घर का एक काम मधु को नहीं करना पड़ता बल्कि सुमेधा जी ही घर का सारा काम करती।उस रात,मधु ने अखिल से कहा " या तुम अपने माँ बाप के साथ रहो या मेरे साथ, या वृद्धाश्रम के कागजात पर दस्तखत करो या हमारे तलाक् के कागजात पर,आज ही फैसला हो जाए इस बात का !!" सुमेधा जी सुन रही थी सब। पर बटे की बसी बसाई शादी पर आंच कैसे आने देती वो?इसीलिए वृद्धाश्रम जाने का फैसला ले लिया था उन्होंने।
      चारों अन्दर की तरफ बढ़ रहे थे। बस कुछ कागजात दस्तखत करने थे,फिर दीनानाथ जी और सुमेधा  जी का ठिकाना वृद्धाश्रम था । दीनानाथ जी को याद आ रहा था जब अखिल आठ साल का था और जब उसका एक्सीडेंट हुआ थे तो वो किस तरह हर अस्पताल उसे गोद में उठाये दौड़ रहे थे और सुमेधा जी ने तो अखिल की पढाई के लिए अपने पुश्तैनी जेवरात भी गिरवी रख दिए थे। क्या कुछ नहीं किया था उन्होंने अखिल के लिए? दीनानाथ जी तो खुद को संभाल रहे थे पर सुमेधा जी? माँ का कलेजा था ,दूर कैसे रह पाती अपने बच्चे से??
भरी आँखों से अखिल को देख रही थी, न जाने कब उसे देखना नसीब हो ?
       ऑफिस पहुँच गए थे चारों। मधु ने अखिल की  कागज़ात बढ़ाये और कहा कर दो दस्तखत ! अखिल के हाथ काँप रहे थे । फिर उसने किसी तरह उन पर हस्ताक्षर कर दिए और मधु के हाथ में वो पन्ने पकड़ा दिए, मधु फूली नहीं समां रही थी। पर ये क्या??? ये तो तलाक के कागजात थे!!
      अखिल ने मधु की ओर देखा और गरज कर बोला " तुम्हे यदि मेरे माँ-बाप के साथ नहीं रहना तो तुम अलग हो सकती हो ! अगर तुम मेरे माँ-बाप की इज्ज़त नहीं कर सकती तो तुम मेरे साथ रहने के काबिल नहीं हो। " अखिल ने अपने माँ-बाप की तरफ देखा और कहा "चलो माँ-बाबा ,घर चलते हैं "। दोनों वृद्ध पति-पत्नी फूट-फूट कर रोने लगे ।ये ख़ुशी के आंसू थे , उन्हें  अपना बेटा "वापिस" जो मिल गया था।







  

November 4, 2012

क्या सच में ?


कहने को कुछ  नहीं
आज मेरे पास
क्या मेरी ख़ामोशी सुनोगे?
 क्या सच में सुनोगे ?

बैठोगे क्या कुछ देर को मेरे पास
और देखोगे लहरों के उफान को
क्या मेरी आँखों में उसे महसूस करोगे ?
क्या सच में महसूस करोगे ?

लिखोगे क्या रेत पर ऊँगली से मेरा नाम
और लहरों के उसे धुंधला देने पर
क्या फिर मेरा नाम लिखोगे?
क्या सच में लिखोगे ?

बारिश में भागती भीड़ में
क्या ठहर जाओगे एक पल को ?
छुपा लोगे एक नन्ही बूँद को हथेली में अपनी
मेरी हथेली में क्या उस बूँद को सजा दोगे?
क्या सच में सजा दोगे ?

मेरे होने से भले ही बदगुमान हो तुम
पर मेरे न होने पर
क्या मुझे याद करोगे?
क्या सच में याद करोगे?







November 2, 2012

वो पीली पतंग

खुले आसमान में पतंगों का मेला सा था
बिन डोर की पतंग जैसा मेरा हाल कुछ अकेला सा था
मन  की बारिश से मैं कुछ गीली सी थी
मैं पतंग अलबेली कुछ नीली सी थी

बहुत सारी  थी आसमान में 
पर वो पीली वाली कुछ प्यारी लगी 
खामोशी में लहराने की
 उसकी आदत मुझे न्यारी लगी 

अपना आसमान मैं उसके साथ बांटती 
कभी मेरी डोर उसे ,कभी उसकी डोर मुझे काटती 
हालांकि हम दोनों की ऊँचाई अलग थी 
पर साथ में उड़ने की क्या कम तलब थी?

मन ही मन मैं सकुचा गयी थी 
हाँ ,वो पीली वाली पतंग मुझे भा गयी थी 

जानती नहीं थी क़ी 
आसमान को रंगीन होने के लिए बस दो रंगों की ज़रुरत होती है 
और जब वो रंग ढक  ले,अपने में आसमान को 
तो फिर डोर की ज़रुरत किसे होती है?

आसमान छुने का शौक था दोनों को ही पर भूल गए थे की 
दोनों की डोर कभी  एक थी ही नहीं 
तब समझ आया की 
आसमान के दो हिस्से हो गए थे 
और वो रंग,
कुछ फीके हो गए थे  

एहसास हुआ फिर की
आसमान गर अलग भी हो तो क्या गम है?
दोनों खुले उड़ते रहे अपने आसमान में
ये ख़ुशी भी क्या कम है?





कहानियाँ

कहाँ से करूँ शुरुआत की
बातें ख़त्म  ही कहाँ होगी ?
हर शुरुआत एक अधूरी कहानी ही तो है
और जब तक मैं हूँ
बातें,यादें और रातें तो जुडती ही जायेंगी

कहते हैं अधूरी कहानियां रातों की नींद ले लेती हैं
पर वो कहानियां अगर पूरी भी हों तो
जानती हूँ मैं
कि फिर भी रातें कटने नहीं देंगी

वो आधी पौनी कहानियां
जो मेरी हर करवट पर  कहती हैं
"उठो ,अच्छे नहीं लगते तुम सोते हुए "
हाँ ,उसी आधी पौनी कहानी के हम हिस्से हैं
एक दूसरे  से बने हुए
एक दूसरे में बुने हुए

जबसे सुनी थी उस प्यार की कहानी
तब ही से जान गयी थी कि
वो चेहरा नहीं बस एक एहसास होगा
और जब एहसास गहरा हो तो
चेहरों की ज़रुरत ही कहाँ पड़ती है?

अब जब ये एहसास रग रग में बस गया है
तो सोचती हूँ की
साथ होना या न होना
मायने ही कितना रखता है ?
होना या न होना जैसे एक ही तो है
कहीं गहरे में जानती हूँ कि
न होना भी तो होना ही है ।




 


एहसास



उसका अलग हो जाना आसान सा लगा पहले 
पर बाद में सांस लेना भी मुश्किल सा लगने लगा 
कहाँ जानती थी की मेरे मन में अधूरेपन की 
खाई बना जायेगा वो ?
साथ उसके सबकुछ पूरा लगता 
पर जब आँख भरी हो तो 
पूरा चाँद भी अधूरा लगता है 
हर बार लगता दौड़ जाऊं उसके पास 
पर कभी-कभी प्यार भी बेसहारा हो जाता है 
 कभी-कभी आपको अलग तब होना पड़ता है 
जब आप जानते हैं की 
वो आपकी रगों में दौड़ रहा होता है 
हर याद जब आँखों के सामने लुका-छिपी खेलती है 
तब महसूस होता है 
"शायद ये वही था"




फिर वही रात जो गुज़रती नहीं

फिर एक  रात
जो गुज़रती नहीं
चुभो जाती है बस एक सवाल "गलती किसकी?"
रंजिशें कहूँ या बेबसी,फर्क अब मैं समझती नहीं
हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं

याद आता है जब वो 
तो हौसला जैसे दो पल को टूट जाता है मेरा 
छिल जाती है रूह तक मेरी 
ख़ामोशी बयान करती है,बस लफ्ज़ अब कुछ कहते नहीं 

हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं

तुझे तकलीफ दूं या खुद को करूँ परेशान
बात तो है मेरे लिए एक ही
खिलखिलाहटों  की भी कुछ  हैं बाकी
जो आज भी मिटती  नहीं

हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं

हँस के कहते थे की
जान भी ले जाओगे तो क्या गम है
जान से ज्यादा ले जाओगे ,इस का अंदाजा भी कहाँ था
भीड़ में रहकर भी
भीड़ में मैं रहती नहीं

हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं

कितना समझाया खुद को की 
नहीं है ज़रुरत मुझे तेरी 
पर तेरी आदत की आदत 
आज भी बदलती नहीं 

हाँ,फिर वही रात
जो गुज़रती नहीं

दिन भर को भूल जाती हूँ तुझे
इस  बाहर के शोर में कहीं
पर होते-होते महसूस होता है की
एक हिस्सा मेरा आज भी तेरे पास है
दिन तो कट जाता है बस
रात ये ढलती नहीं
हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं



महसूस

हाँ, इस बार उससे डरना  मत
भागने की कोशिश  मत  करना
बस एक बार के लिए महसूस करना
होगा बस यही की
वो चीर देगा कलेजे को
झुलसा देगा या
 रुला देगा खून के आंसू
पर दर्द को नज़रंदाज़ करना कब उसकी दवा बन पाया है?
इस बार जब वो निकलना चाहे
तो बस
जाने दो उसे
और देखते तब तक
जब तक वो
आँखों से ओझल न हो जाये

हो ऐसा भी

मासूमियत  भी कितनी ज़रूरी है न?
हाँ ,अपने लिए ही
कभी ऐसा भी हो की जब वो कहे
"हाँ मुझे फ़िक्र है तुम्हारी "
तो बिना सोचे समझे यकीन कर लूं

ऐसा भी हो की  ये ख्याल न आये की
"कहीं इसके पीछे इसका कोई मकसद तो नहीं ?"
हो ऐसा भी की जब वो हाथ आगे बढाए
और पूछे "चलोगी साथ?"
तो बिना सोचे समझे यकीन कर लूं

ऐसा भी हो की कभी न लगे
"ये तो वो है ही नहीं"
हो भी की जब वो बाँहों में समेटे मुझसे कहे
"कहीं नहीं जा रहा तुम्हे छोडकर "
तो मैं उसकी आँखों में देखकर
उस हर लफ्ज़ को सच मान लूं




रात ही रहे

लगे जैसे रात ही रहे
एक कतरा  भी न ढले
एक कदम भी न ढले
एक उम्र जैसे ढल गयी रात देखे हुए
कभी चाँद के नीचे यूंही खड़े हुए
कभी रात में अपनी परछाई ढूंढे हुए

रात बड़ी अपनी सी लगती है
किसी टूटे हुए तार को फिर जोड़ देती है
कभी करवटें लेकर
यादों की करवटें बदलते हैं
कभी उलझे अपने आपसे
उलझनों की सिलवटें बदलते हैं

कभी अलसाई आँखों से
तो कभी खामोश निगाहों से
हर  जी लेते हैं
कभी सोचे "एक सपना ही था"
कभी सोचे "बस एक सपना सा ही था"
कभी सपनों के परों पर
कभी सपनों की छाँव  में रहते हैं
सिमटे हुए हम सपनों की बाहों में रहते हैं'

हर सहर,रात महज़ एक एहसास सी लगती है
गुजरी ही सही,पर आँखों के पास सी लगती है
हर सहर ,रात जैसे याद सी आती है
सच कहूँ,तो जैसे मुझे मुझसे ही जोड़ जाती है


 

जी चाहता है

 कैसे समझाऊं की क्या हालत हो गयी है
बेजान अँधेरे की जैसे आदत सी हो गयी है
अँधेरी स्याह रात में भी अब
तारे गिनने को जी चाहता है
हाँ,आज फिर ख्वाब सजाने को जी चाहता है

खुद से दूर कितना रहे?
अपनी परछाई से कोई कितना डरे?
छत के किनारे खड़े खुद को पुकारने को जी चाहता है
हाँ,अब खुद को महसूस करने को जी चाहता है

लोग कहते हैं,रिश्ते रेत  के घरौंदे जैसे होते हैं
मानो जैसे टूटने के लिए बने होते हैं
पर एक घरौंदा और बनाने को जी चाहता है
हाँ ,एक आखिरी बार कोशिश  करने को जी चाहता है

फिर तुझे खो देने के डर से घबरा उठे हैं 
टूटने के डर से कुछ कदम पीछे उठा चुके हैं 
सबकुछ भूल कर तुझे चाहने को जी चाहता है 
हाँ,कुछ कदम आगे बढाने को जी चाहता है

ख्वाहिशों के झूलों पर झूलने को जी चाहता है
 फिर उन रास्तों पर चलने को जी चाहता है
 खुल के मुस्कुराने को जी चाहता है
 हाँ, जीने को जी चाहता है
 हाँ ,जीने को जी चाहता है .



 

कौन हूँ मैं ?

कौन हूँ मैं
इक चेहरा बेजान सी भीड़ का ?
या इक आंसू दरी सहमी उम्मीद  का ?
मुसाफिर खोयी हुई राहों का?
या चीखता दर्द आहों कराहों का ?
सिलसिला खुद से रंजिशों का ?
या घाव सपनों पर लगी बंदिशों का ?
इक एहसास लहुलुहान सा
या इक ज़ख्म कैद हुई उड़ान का?