August 27, 2014

हरफ़ (word)

आज  फिर गीली आँखों में वो काजल लगा रही है , पता नहीं ये सिलसिला कभी खत्म भी होगा या नहीं।
काजल में भी नमी सी जान पड़ती है जैसे उसने नजाने कितने आंसुओं में खुद को डुबोया है।
मायूस सी सांसें लेते हुए , आईने पर लगी कल की बिंदी अपने माथे पर जड़ देती है।
उम्र कितनी है पूछना चाहते हैं? क्या करेंगे जानकर  , क्योंकि उम्र का और महसूस करने का दूर-दूर तक का कोई ताल्लुक नहीं ।
     रोज़ पांच बजे सब्जी लेने के लिए वो सर झुकाये , थैला सीने से चिपटाए गली से गुज़रती है।
जानबूझकर उसको अनदेखा करते हुए।  हरफ़ को एक नज़र भी देखना उसे गवारा नहीं। कितने लोग उसे मना करते थे कि "ज़ुबैरा !! उस पागल से मोहब्बत मत करना !" पर उसके सारे किस्सों पर वो दिल हार चुकी थी, चाहे वो लैला-मजनू  हो या रोमियो-जूलिएट।  हरफ को वो कभी-कभी जादूगर कह कर पुकारती  क्योंकि वो जब चाहे एक नयी दुनिया बना सकता था।
       कल उसने हरफ़ के कुछ पन्नों पर नज़र डाली और आज वो हरफ से नफरत करने लगी है , क्या हरफ़ को इंसानों की कोई कीमत नहीं ? क्या वो सिर्फ अपनी  खयाली दुनिया से मुहब्बत करता है?
हरफ़ की भी क्या गलती ? प्यार सिर्फ इंसानों से ही नहीं , कहानियों से भी होता है !
उन पन्नों में हरफ़ ने सब कुछ लिखा था , किस तरह वो ज़ुबैरा से मिलेगा  , कितनी मोहब्बते वो उससे करेगा और किस तरह वो एक दूसरे से अलग हो जाएंगे ! और अचम्भे की बात ये थी की सब उसी तरह हो रहा था जिस तरह से उसने लिखा था , बिलकुल उसी तरह ! लग रहा था जैसे ये सब कुछ उसी की सोच थी जैसे हरफ़ बस उसका इस्तेमाल कर रहा था अपनी कहानी पूरी करने के लिए, जैसे हरफ बस अपनी कहानी के लिए ज़ुबैरा को उन रास्तों पर चलवाएगा जो ज़ुबैरा के लिए मौत से भी बदतर  थी !
     पर जिस तरह हरफ़ उसको देखता , किसीने कभी नहीं देखा था।
जैसे हरफ़ कभी ज़ुबैरा हो जाता ,वो जितना खुद को महसूस करती है उतना ही हरफ़ उसे महसूस करता है।
उसके प्यार की बरसात , उसके गुस्से की जलन , उसके खो जाने का डर , उसके सीने में चलती सांस को हरफ़ ही महसूस कर सकता है। हरफ़ से मिलने के बाद ज़ुबैरा को अपना वजूद मिल गया था ।
    वजूद की बात पर आदमी तो मरने-मारने को उतारू हो जाता है।  हर लड़ाई जैसे एक चीख थी कि , "देखो मैं हूँ ! मैं हूँ ! मत कहो की मैं नहीं हूँ , यहाँ देखो मैं हूँ !!" ज़ुबैरा कोई किरदार नहीं थी , वो एक इंसान थी और इस बेइज़्ज़ती से वो सख्त नाराज़ थी !
     ज़ुबैरा रात-भर उसी जलन में करवटें लेती है कि कितनी नाइंसाफी हुई है उसके साथ, कभी वो हरफ से मिलती है तो अपनी रूह को छुपा कर रखती है ये सोच कि वो हरफ को कभी अपना कुछ भी महसूस नहीं करने देगी ,अब वो उसपे भरोसा नहीं कर पाती और शायद इसलिए भी की वो उसकी कहानी को वो कभी पूरी नहीं होनी देगी कि इस कहानी का अंजाम ऐसा बिलकुल नहीं होगा! वो हरफ़ से कभी अलग नहीं होगी !
      एक बच्चे जैसी ज़ुबैरा की ज़िद , हरफ़ अपने पास रखने के लिए वो कुछ भी कर सकती थी चाहे वो दूर ही चले जाना क्यों हो!
     हरफ़ को तो जैसे लत लग गयी है ज़ुबैरा की रूह को महसूस करने की, अब वो जैसे मजबूर सा होने लगा है एकदम लाचार सा और उधर ज़ुबैरा किसी सूखे फूल सी मुरझा रही है , सबकुछ मुट्ठियों में जकड लेना चाहती है , अपना वजूद , अपना हरफ़ ! वो हरफ जो खुद एक हरफ़ बन गया था, बस एक लफ्ज़-एक कहानी बन गया था वो , वो भी ऐसी जिसके सामने वो मजबूर थी   !
     कितने मौसम गुज़र गए , कनखियों से देखती है तो आज बरगद के पेड़ के नीचे हरफ़ दिखाई नहीं पड़ता।
पागलों जैसे दौड़ कर जब उसकी झोपडी पहुँचती है तो देखती है की
वो सीने से घुटने चिपटाए मौत से हार चुका है ,
इतने सालों से जो कुछ बचाने की कोशिश कर रही थी , सब खत्म हो गया ! क्या मिला उसको इस आग में जलकर? न  ही अपना वजूद बचा पायी और न ही अपना हरफ , सबकुछ हार चुकी थी !
      ज़मीन पर पड़े  कागज़ जब उठा कर देखती है तो पढ़ती है , " ज़ुबैरा फिर से खिलना जानेगी मेरे गुजरने के बाद, उसे फिर मुहब्बत होगी"
       ज़ुबैरा टूटकर कहती है "हरफ़, तुम जैसा खुदगर्ज़ इंसान नहीं देखा!"


"तेरी तलाश में मेरा वजूद ही न रहा 
तबाह कर गयी मेरी हस्ती को, आरज़ू तेरी !"

November 5, 2012

वापिस

            कार रुकी । कार में से 4 लोग उतरे। दीनानाथ जी ,उनकी धर्मपत्नी सुमेधा जी, उनका बेटा अखिल और उनकी बहु मधु ।
            दीनानाथ जी और सुमेधा जी डबडबायी आँखों से वो उस इमारत को देख रहे थे जहाँ आने की कल्पना उन्होंने सपने में भी नहीं की थी।वो शहर के एक वृद्धाश्रम के सामने खड़े थे । दोनों वृद्ध पति-पत्नी यही सोच रहे थे की क्या गुनाह कर दिया था उन्होंने , कि  उन्हें ये दिन देखना पड़ा,क्या कमी रह गयी थी उनके प्यार में? आर्थिक तंगी के बावजूद भी अपने बेटे को पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर बनाया था और जब बेटे ने कहा की वो अपनी पसंद से शादी करेगा, तब भी उन्होंने बिलकुल मना नहीं किया। मधु एक उच्च परिवार की लड़की थी और सुमेधाजी तो उसे पलकों पे रखती । घर का एक काम मधु को नहीं करना पड़ता बल्कि सुमेधा जी ही घर का सारा काम करती।उस रात,मधु ने अखिल से कहा " या तुम अपने माँ बाप के साथ रहो या मेरे साथ, या वृद्धाश्रम के कागजात पर दस्तखत करो या हमारे तलाक् के कागजात पर,आज ही फैसला हो जाए इस बात का !!" सुमेधा जी सुन रही थी सब। पर बटे की बसी बसाई शादी पर आंच कैसे आने देती वो?इसीलिए वृद्धाश्रम जाने का फैसला ले लिया था उन्होंने।
      चारों अन्दर की तरफ बढ़ रहे थे। बस कुछ कागजात दस्तखत करने थे,फिर दीनानाथ जी और सुमेधा  जी का ठिकाना वृद्धाश्रम था । दीनानाथ जी को याद आ रहा था जब अखिल आठ साल का था और जब उसका एक्सीडेंट हुआ थे तो वो किस तरह हर अस्पताल उसे गोद में उठाये दौड़ रहे थे और सुमेधा जी ने तो अखिल की पढाई के लिए अपने पुश्तैनी जेवरात भी गिरवी रख दिए थे। क्या कुछ नहीं किया था उन्होंने अखिल के लिए? दीनानाथ जी तो खुद को संभाल रहे थे पर सुमेधा जी? माँ का कलेजा था ,दूर कैसे रह पाती अपने बच्चे से??
भरी आँखों से अखिल को देख रही थी, न जाने कब उसे देखना नसीब हो ?
       ऑफिस पहुँच गए थे चारों। मधु ने अखिल की  कागज़ात बढ़ाये और कहा कर दो दस्तखत ! अखिल के हाथ काँप रहे थे । फिर उसने किसी तरह उन पर हस्ताक्षर कर दिए और मधु के हाथ में वो पन्ने पकड़ा दिए, मधु फूली नहीं समां रही थी। पर ये क्या??? ये तो तलाक के कागजात थे!!
      अखिल ने मधु की ओर देखा और गरज कर बोला " तुम्हे यदि मेरे माँ-बाप के साथ नहीं रहना तो तुम अलग हो सकती हो ! अगर तुम मेरे माँ-बाप की इज्ज़त नहीं कर सकती तो तुम मेरे साथ रहने के काबिल नहीं हो। " अखिल ने अपने माँ-बाप की तरफ देखा और कहा "चलो माँ-बाबा ,घर चलते हैं "। दोनों वृद्ध पति-पत्नी फूट-फूट कर रोने लगे ।ये ख़ुशी के आंसू थे , उन्हें  अपना बेटा "वापिस" जो मिल गया था।







  

November 4, 2012

क्या सच में ?


कहने को कुछ  नहीं
आज मेरे पास
क्या मेरी ख़ामोशी सुनोगे?
 क्या सच में सुनोगे ?

बैठोगे क्या कुछ देर को मेरे पास
और देखोगे लहरों के उफान को
क्या मेरी आँखों में उसे महसूस करोगे ?
क्या सच में महसूस करोगे ?

लिखोगे क्या रेत पर ऊँगली से मेरा नाम
और लहरों के उसे धुंधला देने पर
क्या फिर मेरा नाम लिखोगे?
क्या सच में लिखोगे ?

बारिश में भागती भीड़ में
क्या ठहर जाओगे एक पल को ?
छुपा लोगे एक नन्ही बूँद को हथेली में अपनी
मेरी हथेली में क्या उस बूँद को सजा दोगे?
क्या सच में सजा दोगे ?

मेरे होने से भले ही बदगुमान हो तुम
पर मेरे न होने पर
क्या मुझे याद करोगे?
क्या सच में याद करोगे?







November 2, 2012

वो पीली पतंग

खुले आसमान में पतंगों का मेला सा था
बिन डोर की पतंग जैसा मेरा हाल कुछ अकेला सा था
मन  की बारिश से मैं कुछ गीली सी थी
मैं पतंग अलबेली कुछ नीली सी थी

बहुत सारी  थी आसमान में 
पर वो पीली वाली कुछ प्यारी लगी 
खामोशी में लहराने की
 उसकी आदत मुझे न्यारी लगी 

अपना आसमान मैं उसके साथ बांटती 
कभी मेरी डोर उसे ,कभी उसकी डोर मुझे काटती 
हालांकि हम दोनों की ऊँचाई अलग थी 
पर साथ में उड़ने की क्या कम तलब थी?

मन ही मन मैं सकुचा गयी थी 
हाँ ,वो पीली वाली पतंग मुझे भा गयी थी 

जानती नहीं थी क़ी 
आसमान को रंगीन होने के लिए बस दो रंगों की ज़रुरत होती है 
और जब वो रंग ढक  ले,अपने में आसमान को 
तो फिर डोर की ज़रुरत किसे होती है?

आसमान छुने का शौक था दोनों को ही पर भूल गए थे की 
दोनों की डोर कभी  एक थी ही नहीं 
तब समझ आया की 
आसमान के दो हिस्से हो गए थे 
और वो रंग,
कुछ फीके हो गए थे  

एहसास हुआ फिर की
आसमान गर अलग भी हो तो क्या गम है?
दोनों खुले उड़ते रहे अपने आसमान में
ये ख़ुशी भी क्या कम है?





कहानियाँ

कहाँ से करूँ शुरुआत की
बातें ख़त्म  ही कहाँ होगी ?
हर शुरुआत एक अधूरी कहानी ही तो है
और जब तक मैं हूँ
बातें,यादें और रातें तो जुडती ही जायेंगी

कहते हैं अधूरी कहानियां रातों की नींद ले लेती हैं
पर वो कहानियां अगर पूरी भी हों तो
जानती हूँ मैं
कि फिर भी रातें कटने नहीं देंगी

वो आधी पौनी कहानियां
जो मेरी हर करवट पर  कहती हैं
"उठो ,अच्छे नहीं लगते तुम सोते हुए "
हाँ ,उसी आधी पौनी कहानी के हम हिस्से हैं
एक दूसरे  से बने हुए
एक दूसरे में बुने हुए

जबसे सुनी थी उस प्यार की कहानी
तब ही से जान गयी थी कि
वो चेहरा नहीं बस एक एहसास होगा
और जब एहसास गहरा हो तो
चेहरों की ज़रुरत ही कहाँ पड़ती है?

अब जब ये एहसास रग रग में बस गया है
तो सोचती हूँ की
साथ होना या न होना
मायने ही कितना रखता है ?
होना या न होना जैसे एक ही तो है
कहीं गहरे में जानती हूँ कि
न होना भी तो होना ही है ।




 


एहसास



उसका अलग हो जाना आसान सा लगा पहले 
पर बाद में सांस लेना भी मुश्किल सा लगने लगा 
कहाँ जानती थी की मेरे मन में अधूरेपन की 
खाई बना जायेगा वो ?
साथ उसके सबकुछ पूरा लगता 
पर जब आँख भरी हो तो 
पूरा चाँद भी अधूरा लगता है 
हर बार लगता दौड़ जाऊं उसके पास 
पर कभी-कभी प्यार भी बेसहारा हो जाता है 
 कभी-कभी आपको अलग तब होना पड़ता है 
जब आप जानते हैं की 
वो आपकी रगों में दौड़ रहा होता है 
हर याद जब आँखों के सामने लुका-छिपी खेलती है 
तब महसूस होता है 
"शायद ये वही था"




फिर वही रात जो गुज़रती नहीं

फिर एक  रात
जो गुज़रती नहीं
चुभो जाती है बस एक सवाल "गलती किसकी?"
रंजिशें कहूँ या बेबसी,फर्क अब मैं समझती नहीं
हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं

याद आता है जब वो 
तो हौसला जैसे दो पल को टूट जाता है मेरा 
छिल जाती है रूह तक मेरी 
ख़ामोशी बयान करती है,बस लफ्ज़ अब कुछ कहते नहीं 

हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं

तुझे तकलीफ दूं या खुद को करूँ परेशान
बात तो है मेरे लिए एक ही
खिलखिलाहटों  की भी कुछ  हैं बाकी
जो आज भी मिटती  नहीं

हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं

हँस के कहते थे की
जान भी ले जाओगे तो क्या गम है
जान से ज्यादा ले जाओगे ,इस का अंदाजा भी कहाँ था
भीड़ में रहकर भी
भीड़ में मैं रहती नहीं

हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं

कितना समझाया खुद को की 
नहीं है ज़रुरत मुझे तेरी 
पर तेरी आदत की आदत 
आज भी बदलती नहीं 

हाँ,फिर वही रात
जो गुज़रती नहीं

दिन भर को भूल जाती हूँ तुझे
इस  बाहर के शोर में कहीं
पर होते-होते महसूस होता है की
एक हिस्सा मेरा आज भी तेरे पास है
दिन तो कट जाता है बस
रात ये ढलती नहीं
हाँ,फिर वही रात
 जो गुज़रती नहीं