November 2, 2012

कहानियाँ

कहाँ से करूँ शुरुआत की
बातें ख़त्म  ही कहाँ होगी ?
हर शुरुआत एक अधूरी कहानी ही तो है
और जब तक मैं हूँ
बातें,यादें और रातें तो जुडती ही जायेंगी

कहते हैं अधूरी कहानियां रातों की नींद ले लेती हैं
पर वो कहानियां अगर पूरी भी हों तो
जानती हूँ मैं
कि फिर भी रातें कटने नहीं देंगी

वो आधी पौनी कहानियां
जो मेरी हर करवट पर  कहती हैं
"उठो ,अच्छे नहीं लगते तुम सोते हुए "
हाँ ,उसी आधी पौनी कहानी के हम हिस्से हैं
एक दूसरे  से बने हुए
एक दूसरे में बुने हुए

जबसे सुनी थी उस प्यार की कहानी
तब ही से जान गयी थी कि
वो चेहरा नहीं बस एक एहसास होगा
और जब एहसास गहरा हो तो
चेहरों की ज़रुरत ही कहाँ पड़ती है?

अब जब ये एहसास रग रग में बस गया है
तो सोचती हूँ की
साथ होना या न होना
मायने ही कितना रखता है ?
होना या न होना जैसे एक ही तो है
कहीं गहरे में जानती हूँ कि
न होना भी तो होना ही है ।




 


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