आज फिर गीली आँखों में वो काजल लगा रही है , पता नहीं ये सिलसिला कभी खत्म भी होगा या नहीं।
काजल में भी नमी सी जान पड़ती है जैसे उसने नजाने कितने आंसुओं में खुद को डुबोया है।
मायूस सी सांसें लेते हुए , आईने पर लगी कल की बिंदी अपने माथे पर जड़ देती है।
उम्र कितनी है पूछना चाहते हैं? क्या करेंगे जानकर , क्योंकि उम्र का और महसूस करने का दूर-दूर तक का कोई ताल्लुक नहीं ।
रोज़ पांच बजे सब्जी लेने के लिए वो सर झुकाये , थैला सीने से चिपटाए गली से गुज़रती है।
जानबूझकर उसको अनदेखा करते हुए। हरफ़ को एक नज़र भी देखना उसे गवारा नहीं। कितने लोग उसे मना करते थे कि "ज़ुबैरा !! उस पागल से मोहब्बत मत करना !" पर उसके सारे किस्सों पर वो दिल हार चुकी थी, चाहे वो लैला-मजनू हो या रोमियो-जूलिएट। हरफ को वो कभी-कभी जादूगर कह कर पुकारती क्योंकि वो जब चाहे एक नयी दुनिया बना सकता था।
कल उसने हरफ़ के कुछ पन्नों पर नज़र डाली और आज वो हरफ से नफरत करने लगी है , क्या हरफ़ को इंसानों की कोई कीमत नहीं ? क्या वो सिर्फ अपनी खयाली दुनिया से मुहब्बत करता है?
हरफ़ की भी क्या गलती ? प्यार सिर्फ इंसानों से ही नहीं , कहानियों से भी होता है !
उन पन्नों में हरफ़ ने सब कुछ लिखा था , किस तरह वो ज़ुबैरा से मिलेगा , कितनी मोहब्बते वो उससे करेगा और किस तरह वो एक दूसरे से अलग हो जाएंगे ! और अचम्भे की बात ये थी की सब उसी तरह हो रहा था जिस तरह से उसने लिखा था , बिलकुल उसी तरह ! लग रहा था जैसे ये सब कुछ उसी की सोच थी जैसे हरफ़ बस उसका इस्तेमाल कर रहा था अपनी कहानी पूरी करने के लिए, जैसे हरफ बस अपनी कहानी के लिए ज़ुबैरा को उन रास्तों पर चलवाएगा जो ज़ुबैरा के लिए मौत से भी बदतर थी !
पर जिस तरह हरफ़ उसको देखता , किसीने कभी नहीं देखा था।
जैसे हरफ़ कभी ज़ुबैरा हो जाता ,वो जितना खुद को महसूस करती है उतना ही हरफ़ उसे महसूस करता है।
उसके प्यार की बरसात , उसके गुस्से की जलन , उसके खो जाने का डर , उसके सीने में चलती सांस को हरफ़ ही महसूस कर सकता है। हरफ़ से मिलने के बाद ज़ुबैरा को अपना वजूद मिल गया था ।
वजूद की बात पर आदमी तो मरने-मारने को उतारू हो जाता है। हर लड़ाई जैसे एक चीख थी कि , "देखो मैं हूँ ! मैं हूँ ! मत कहो की मैं नहीं हूँ , यहाँ देखो मैं हूँ !!" ज़ुबैरा कोई किरदार नहीं थी , वो एक इंसान थी और इस बेइज़्ज़ती से वो सख्त नाराज़ थी !
ज़ुबैरा रात-भर उसी जलन में करवटें लेती है कि कितनी नाइंसाफी हुई है उसके साथ, कभी वो हरफ से मिलती है तो अपनी रूह को छुपा कर रखती है ये सोच कि वो हरफ को कभी अपना कुछ भी महसूस नहीं करने देगी ,अब वो उसपे भरोसा नहीं कर पाती और शायद इसलिए भी की वो उसकी कहानी को वो कभी पूरी नहीं होनी देगी कि इस कहानी का अंजाम ऐसा बिलकुल नहीं होगा! वो हरफ़ से कभी अलग नहीं होगी !
एक बच्चे जैसी ज़ुबैरा की ज़िद , हरफ़ अपने पास रखने के लिए वो कुछ भी कर सकती थी चाहे वो दूर ही चले जाना क्यों हो!
हरफ़ को तो जैसे लत लग गयी है ज़ुबैरा की रूह को महसूस करने की, अब वो जैसे मजबूर सा होने लगा है एकदम लाचार सा और उधर ज़ुबैरा किसी सूखे फूल सी मुरझा रही है , सबकुछ मुट्ठियों में जकड लेना चाहती है , अपना वजूद , अपना हरफ़ ! वो हरफ जो खुद एक हरफ़ बन गया था, बस एक लफ्ज़-एक कहानी बन गया था वो , वो भी ऐसी जिसके सामने वो मजबूर थी !
कितने मौसम गुज़र गए , कनखियों से देखती है तो आज बरगद के पेड़ के नीचे हरफ़ दिखाई नहीं पड़ता।
पागलों जैसे दौड़ कर जब उसकी झोपडी पहुँचती है तो देखती है की
वो सीने से घुटने चिपटाए मौत से हार चुका है ,
इतने सालों से जो कुछ बचाने की कोशिश कर रही थी , सब खत्म हो गया ! क्या मिला उसको इस आग में जलकर? न ही अपना वजूद बचा पायी और न ही अपना हरफ , सबकुछ हार चुकी थी !
ज़मीन पर पड़े कागज़ जब उठा कर देखती है तो पढ़ती है , " ज़ुबैरा फिर से खिलना जानेगी मेरे गुजरने के बाद, उसे फिर मुहब्बत होगी"
ज़ुबैरा टूटकर कहती है "हरफ़, तुम जैसा खुदगर्ज़ इंसान नहीं देखा!"
"तेरी तलाश में मेरा वजूद ही न रहा
तबाह कर गयी मेरी हस्ती को, आरज़ू तेरी !"
काजल में भी नमी सी जान पड़ती है जैसे उसने नजाने कितने आंसुओं में खुद को डुबोया है।
मायूस सी सांसें लेते हुए , आईने पर लगी कल की बिंदी अपने माथे पर जड़ देती है।
उम्र कितनी है पूछना चाहते हैं? क्या करेंगे जानकर , क्योंकि उम्र का और महसूस करने का दूर-दूर तक का कोई ताल्लुक नहीं ।
रोज़ पांच बजे सब्जी लेने के लिए वो सर झुकाये , थैला सीने से चिपटाए गली से गुज़रती है।
जानबूझकर उसको अनदेखा करते हुए। हरफ़ को एक नज़र भी देखना उसे गवारा नहीं। कितने लोग उसे मना करते थे कि "ज़ुबैरा !! उस पागल से मोहब्बत मत करना !" पर उसके सारे किस्सों पर वो दिल हार चुकी थी, चाहे वो लैला-मजनू हो या रोमियो-जूलिएट। हरफ को वो कभी-कभी जादूगर कह कर पुकारती क्योंकि वो जब चाहे एक नयी दुनिया बना सकता था।
कल उसने हरफ़ के कुछ पन्नों पर नज़र डाली और आज वो हरफ से नफरत करने लगी है , क्या हरफ़ को इंसानों की कोई कीमत नहीं ? क्या वो सिर्फ अपनी खयाली दुनिया से मुहब्बत करता है?
हरफ़ की भी क्या गलती ? प्यार सिर्फ इंसानों से ही नहीं , कहानियों से भी होता है !
उन पन्नों में हरफ़ ने सब कुछ लिखा था , किस तरह वो ज़ुबैरा से मिलेगा , कितनी मोहब्बते वो उससे करेगा और किस तरह वो एक दूसरे से अलग हो जाएंगे ! और अचम्भे की बात ये थी की सब उसी तरह हो रहा था जिस तरह से उसने लिखा था , बिलकुल उसी तरह ! लग रहा था जैसे ये सब कुछ उसी की सोच थी जैसे हरफ़ बस उसका इस्तेमाल कर रहा था अपनी कहानी पूरी करने के लिए, जैसे हरफ बस अपनी कहानी के लिए ज़ुबैरा को उन रास्तों पर चलवाएगा जो ज़ुबैरा के लिए मौत से भी बदतर थी !
पर जिस तरह हरफ़ उसको देखता , किसीने कभी नहीं देखा था।
जैसे हरफ़ कभी ज़ुबैरा हो जाता ,वो जितना खुद को महसूस करती है उतना ही हरफ़ उसे महसूस करता है।
उसके प्यार की बरसात , उसके गुस्से की जलन , उसके खो जाने का डर , उसके सीने में चलती सांस को हरफ़ ही महसूस कर सकता है। हरफ़ से मिलने के बाद ज़ुबैरा को अपना वजूद मिल गया था ।
वजूद की बात पर आदमी तो मरने-मारने को उतारू हो जाता है। हर लड़ाई जैसे एक चीख थी कि , "देखो मैं हूँ ! मैं हूँ ! मत कहो की मैं नहीं हूँ , यहाँ देखो मैं हूँ !!" ज़ुबैरा कोई किरदार नहीं थी , वो एक इंसान थी और इस बेइज़्ज़ती से वो सख्त नाराज़ थी !
ज़ुबैरा रात-भर उसी जलन में करवटें लेती है कि कितनी नाइंसाफी हुई है उसके साथ, कभी वो हरफ से मिलती है तो अपनी रूह को छुपा कर रखती है ये सोच कि वो हरफ को कभी अपना कुछ भी महसूस नहीं करने देगी ,अब वो उसपे भरोसा नहीं कर पाती और शायद इसलिए भी की वो उसकी कहानी को वो कभी पूरी नहीं होनी देगी कि इस कहानी का अंजाम ऐसा बिलकुल नहीं होगा! वो हरफ़ से कभी अलग नहीं होगी !
एक बच्चे जैसी ज़ुबैरा की ज़िद , हरफ़ अपने पास रखने के लिए वो कुछ भी कर सकती थी चाहे वो दूर ही चले जाना क्यों हो!
हरफ़ को तो जैसे लत लग गयी है ज़ुबैरा की रूह को महसूस करने की, अब वो जैसे मजबूर सा होने लगा है एकदम लाचार सा और उधर ज़ुबैरा किसी सूखे फूल सी मुरझा रही है , सबकुछ मुट्ठियों में जकड लेना चाहती है , अपना वजूद , अपना हरफ़ ! वो हरफ जो खुद एक हरफ़ बन गया था, बस एक लफ्ज़-एक कहानी बन गया था वो , वो भी ऐसी जिसके सामने वो मजबूर थी !
कितने मौसम गुज़र गए , कनखियों से देखती है तो आज बरगद के पेड़ के नीचे हरफ़ दिखाई नहीं पड़ता।
पागलों जैसे दौड़ कर जब उसकी झोपडी पहुँचती है तो देखती है की
वो सीने से घुटने चिपटाए मौत से हार चुका है ,
इतने सालों से जो कुछ बचाने की कोशिश कर रही थी , सब खत्म हो गया ! क्या मिला उसको इस आग में जलकर? न ही अपना वजूद बचा पायी और न ही अपना हरफ , सबकुछ हार चुकी थी !
ज़मीन पर पड़े कागज़ जब उठा कर देखती है तो पढ़ती है , " ज़ुबैरा फिर से खिलना जानेगी मेरे गुजरने के बाद, उसे फिर मुहब्बत होगी"
ज़ुबैरा टूटकर कहती है "हरफ़, तुम जैसा खुदगर्ज़ इंसान नहीं देखा!"
"तेरी तलाश में मेरा वजूद ही न रहा
तबाह कर गयी मेरी हस्ती को, आरज़ू तेरी !"