लगे जैसे रात ही रहे
एक कतरा भी न ढले
एक कदम भी न ढले
एक उम्र जैसे ढल गयी रात देखे हुए
कभी चाँद के नीचे यूंही खड़े हुए
कभी रात में अपनी परछाई ढूंढे हुए
रात बड़ी अपनी सी लगती है
किसी टूटे हुए तार को फिर जोड़ देती है
कभी करवटें लेकर
यादों की करवटें बदलते हैं
कभी उलझे अपने आपसे
उलझनों की सिलवटें बदलते हैं
कभी अलसाई आँखों से
तो कभी खामोश निगाहों से
हर जी लेते हैं
कभी सोचे "एक सपना ही था"
कभी सोचे "बस एक सपना सा ही था"
कभी सपनों के परों पर
कभी सपनों की छाँव में रहते हैं
सिमटे हुए हम सपनों की बाहों में रहते हैं'
हर सहर,रात महज़ एक एहसास सी लगती है
गुजरी ही सही,पर आँखों के पास सी लगती है
हर सहर ,रात जैसे याद सी आती है
सच कहूँ,तो जैसे मुझे मुझसे ही जोड़ जाती है
एक कतरा भी न ढले
एक कदम भी न ढले
एक उम्र जैसे ढल गयी रात देखे हुए
कभी चाँद के नीचे यूंही खड़े हुए
कभी रात में अपनी परछाई ढूंढे हुए
रात बड़ी अपनी सी लगती है
किसी टूटे हुए तार को फिर जोड़ देती है
कभी करवटें लेकर
यादों की करवटें बदलते हैं
कभी उलझे अपने आपसे
उलझनों की सिलवटें बदलते हैं
कभी अलसाई आँखों से
तो कभी खामोश निगाहों से
हर जी लेते हैं
कभी सोचे "एक सपना ही था"
कभी सोचे "बस एक सपना सा ही था"
कभी सपनों के परों पर
कभी सपनों की छाँव में रहते हैं
सिमटे हुए हम सपनों की बाहों में रहते हैं'
हर सहर,रात महज़ एक एहसास सी लगती है
गुजरी ही सही,पर आँखों के पास सी लगती है
हर सहर ,रात जैसे याद सी आती है
सच कहूँ,तो जैसे मुझे मुझसे ही जोड़ जाती है
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