कहने को कुछ नहीं
आज मेरे पास
क्या मेरी ख़ामोशी सुनोगे?
क्या सच में सुनोगे ?
बैठोगे क्या कुछ देर को मेरे पास
और देखोगे लहरों के उफान को
क्या मेरी आँखों में उसे महसूस करोगे ?
क्या सच में महसूस करोगे ?
लिखोगे क्या रेत पर ऊँगली से मेरा नाम
और लहरों के उसे धुंधला देने पर
क्या फिर मेरा नाम लिखोगे?
क्या सच में लिखोगे ?
बारिश में भागती भीड़ में
क्या ठहर जाओगे एक पल को ?
छुपा लोगे एक नन्ही बूँद को हथेली में अपनी
मेरी हथेली में क्या उस बूँद को सजा दोगे?
क्या सच में सजा दोगे ?
मेरे होने से भले ही बदगुमान हो तुम
पर मेरे न होने पर
क्या मुझे याद करोगे?
क्या सच में याद करोगे?
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